भारत के कपड़ा उद्योग का भविष्य

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भारत में कपड़े का उद्योग सबसे पुराने उद्योगों में से एक रहा है। भारत मे सदियों से स्थापित कपड़े का उद्योग सुधार के साथ साथ निरंतर विकास कर रहा है। समय के साथ इन उद्योगों में काफी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अगले 5 सालों में कपड़ा उद्योग 200 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो जाने की संभावना है। खेती के मामले में देखा जाए तो भारत कपास का सबसे बड़ा उत्पादक सिद्ध हुआ है।

इतिहास

अंग्रेजी शासन काल में यूरोपीय बाजारों में कपास के सफल उत्पादन होने की वजह से उद्योगों में भी काफी तेजी से विकास होने लगा था। भारत मे 1920 में एक खादी आंदोलन शुरू हुआ था। जिसमें अंग्रेजी सूती उत्पादों का बहिष्कार किया जा रहा था और साधारण घरेलू पद्धति से तैयार सूती वस्त्रों के उपयोग का प्रयास किया गया।

1957 में जब देश आजाद हो गया तब खादी, ग्राम और उद्योग आयोग का गठन किया गया। 1989 में बॉम्बे में पहली बार खादी कपड़ों का फैशन शो आयोजत किया गया था। जिसमें लगभग 80 अलग अलग तरह के कपड़े का प्रदर्शन किया गया। जिससे खादी को पहचान मिलने लगी। सुना गया है कि 1990 के दशक में एक फैशन डिज़ाइनर रितु बेरी ने दिल्ली में आयोजित ट्री ऑफ लाइफ शो के दौरान अपना पहला खादी का संग्रह प्रस्तुत किया था।

भारत के कपड़ा उद्योग का उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने वाले कारक –

भारत में कपड़ा उद्योग की क्षमता अन्य क्षेत्रों से काफी आलग है। कच्चे माल की सम्पन्नता एवं विस्तृत श्रृंखला वाले कपड़े का मजबूत उत्पादन आधार, कपड़ा उद्योग  को ताकत प्रदान करते हैं। नई तकनीकी जिसमे कम लागत में अधिक से अधिक उत्पादन हो सकता है, कुशल कारीगर, अच्छी गुणवत्ता, भरपूर्ण उपकरण जैसे स्त्रोतों की उपलब्धता की वजह से कपड़े के उद्योगों को विकास कर पाने में प्रोत्साहन मिला है। पारंपरिक हथकरधा और नई तकनीकी मशीनों के उत्पादन में बहुत बड़ा अंतर समझ आया है।

गुणवत्ता

भारत का कपड़ा उद्योग अब नई ऊंचाइयों को छूने की कोशिश कर रहा है। विश्व में भारत दूसरा सबसे बड़ा कपड़े का निर्यातक देश बन जाने की वजह से, भारत के कपड़ा उत्पादकों को कपड़े की गुणवत्ता को और अधिक अच्छा बनाने और अपनी उत्पादन क्षमता को दुगनी करने की ओर प्रोत्साहन मिल रहा है। नए नए खिलाड़ियों को भी इस क्षेत्र में आगे बढ़कर अपना हुनर दिखाने का मौका मिल रहा है।

पुराने समय में कुशल कारीगर ही फिजिकल रूप से अपने हुनर के बल पर कपड़े की गुणवत्ता को बना पाता था, लेकिन वर्तमान में गुणवत्ता नियंत्रित करने के लिए नई तकनीकी का उपयोग किया जा रहा है। आजकल ऑटोबर्स्ट 70, डिजिटल टैकोमीटर सीई, स्ट्रोबोस्कोप, टीपीआई टेस्टर, मॉइस्चर मीटर जैसे उपकरणों का उपयोग करके कताई मिलें हाई प्रोडक्शन के साथ साथ अच्छी क्वालिटी को मेंटेन कर रहे है।

रेडीमेड बाजार

जिस तरह से भारत में कपड़ा उत्पादन इकाइयाँ नए जमाने के साथ साथ चलने के लिए निरंतर प्रयत्नरत हैं। उसी प्रकार अच्छी गुणवत्ता से बने कपड़े से मॉडर्न और स्टाइलिश आकार के रेडीमेड परिधान के बाजार में भी भारत ने विदेशों तक अपने धाक जमा ली है। भारत रेडीमेड कपड़ों का निर्यात बहुत बड़ी मात्रा में कर रहा है।

भारत के निवासियों ने पश्चिमी देशों के कल्चर और उनकी वेशभूषा को सबसे अधिक पसन्द किया है। पारंपरिक लिबास काफी अधिक कपड़े की मात्रा में तैयार किए जाते थे। जिन्हें धारण करना आज कल लोगो को आसान नही लगता है। हालांकि ये बात भी सच है कि पारंपरिक लिबास में लोगो का जो रूप निखरकर आता है, वो रूप पश्चिमी लिबास में नहीं आ सकता।

भारत मे पशिमी सभ्यता को अपनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि पश्चिमी देशों के लिबास पहनने में आरामदायक होते हैं। जिनको बनाने में भी उत्पादनकर्ता को सबसे कम खर्च आता है। इसलिए भारत मे रेडीमेड कपड़ों का उत्पादन अधिक से अधिक होने लगा है और ये रेडीमेड कपड़ों की भारत से बाहर भी डिमांड सबसे अधिक है।

इसके अतिरिक्त भारत अपने पारंपरिक लिबास को भी भारत से बाहर निर्यात करता है। भारत के कल्चर को विदेशों में काफी अधिक पसन्द किया जाने लगा है। पश्चिमी देश भारत के परिधानों को पहनना पसंद करते हैं।

इन सभी कारकों से ये अंदाज लगाया जा सकता है कि भारत मे कपड़े के उद्योगों का भविष्य काफी उज्ज्वल रहेगा। केवल अपने देश तक ही नहीं विदेशों तक भारत अपने देश के कपड़े की गुणवत्ता और बनावट से भी दिन पर दिन तरक्की करता रहेगा।

भारत के कपड़ा उद्योग का भविष्य

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